आखिर रुस द्वारा यूक्रेन पर हमला क्यों ?


1रूस की सुरक्षा के लिए यूक्रेन सबसे जरूरी
2.NATO का विस्तार रोककर अमेरिका पर बढ़त बनाने की कोशिश
3.यूरोपीय देशों को अपनी ताकत का अहसास कराना
4.पुतिन चाहते हैं रूस के सोवियत संघ वाले दिन लौटाना
5.सत्ता पर पकड़ और लोकप्रियता दोनों बनाए रखना चाहते हैं पुतिन

रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जंग छेड़ दी है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन के यूक्रेन के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के आदेश के बाद यूक्रेन में विद्रोहियों के कब्जे वाले इलाके और राजधानी कीव में बम धमाकों की खबर है। रूस ने दावा किया है कि उसने यूक्रेन के 70 सैन्य ठिकानों को नष्ट कर दिया है, जिनमें से 11 एयरफील्ड हैं। रूसी राष्ट्रपति पुतिन ने NATO को भी धमकी दी है कि अगर उसने यूक्रेन का साथ दिया तो उसे भी इसके नतीजे भुगतने को तैयार रहना चाहिए।

ऐसे प्रश्न यह है कि पुतिन ने आखिर यूक्रेन पर हमला क्यों किया। क्या पुतिन नाटो को मॉस्को से 1600 किमी दूर रखने के साथ क्रेमलिन पर अपनी पकड़ पुख्ता करना चाहते हैं।

ऐसे में चलिए समझते हैं कि आखिर क्या है रूस की यूक्रेन के खिलाफ आक्रामकता की असली वजह ? यूक्रेन पर हमला करके पुतिन आखिर क्या हासिल करना चाहते हैं ?

रूस की सुरक्षा के लिए यूक्रेन सबसे जरूरी

1991 में सोवियत संघ के बिखरने के बाद बने यूक्रेन को शुरू से ही रूस अपने पाले में करने की कोशिशें करता आया है। हालांकि, यूक्रेन रूसी प्रभुत्व से खुद को बचाए रखने के लिए पश्चिमी देशों की ओर झुका रहा।

दिसंबर 2021 में यूक्रेन ने अमेरिकी दबदबे वाले दुनिया के सबसे ताकतवर सैन्य गठबंधन NATO, यानी North Atlantic Treaty Organization से जुड़ने की इच्छा जाहिर की थी। यूक्रेन की ये कोशिश रूस को नागवार गुजरी और उसने यूक्रेन को रोकने के लिए उसकी सीमा पर लाखों की फौज तैनात कर दी।

दरअसल, यूक्रेन की रूस के साथ 2200 किमी से ज्यादा लंबी सीमा है। रूस का मानना है कि अगर यूक्रेन NATO से जुड़ता है तो NATO सेनाएं यूक्रेन के बहाने रूसी सीमा तक पहुंच जाएंगी।

ऐसे में रूस की राजधानी मॉस्को की पश्चिमी देशों से दूरी केवल 640 किलोमीटर रह जाएगी। अभी ये दूरी करीब 1600 किलोमीटर है।

उधर, अमेरिका भी अपनी हरकत से बाज नहीं आ रहा है। सोवियत संघ के टूटने के बाद 15 से ज्यादा यूरोपीय देश NATO में शामिल हो चुके हैं। अब वह यूक्रेन को भी NATO में शामिल करना चाहता है।

इसीलिए रूस चाहता है कि यूक्रेन ये गांरटी दे कि वह कभी भी NATO से नहीं जुड़ेगा।

NATO का विस्तार रोककर अमेरिका पर बढ़त बनाने की कोशिश

रूस ने साफ तौर पर कहा है कि उसकी सेनाएं तब तक पीछे नहीं हटेंगी जब तक कि यूक्रेन इस बात की गारंटी नहीं दे देता कि वह NATO से कभी नहीं जुड़ेगा।

NATO में भले ही अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और कई यूरोपीय देशों समेत 30 देश शामिल हों, लेकिन रूस का NATO को रोकने से असली मतलब रूस के आसपास या यूरोप में अमेरिकी प्रभुत्व को बढ़ने से रोकना है।

रूस की मांग है कि NATO 1997 से पहले वाली स्थिति में लौट जाए, यानी उसने यूरोप में जो सैन्य ठिकाने बनाए हैं, उन्हें हटा ले।

रूस चाहता है कि NATO गारंटी दे कि वह रूस की सीमा के पास घातक हथियारों की तैनाती नहीं करेगा। अगर NATO ऐसा करता है तो उसे केंद्रीय यूरोप, पूर्व यूरोप और बाल्टिक क्षेत्र से अपनी सेनाओं को हटाना होगा।

रूस के विरोध के बावजूद 1991 में सोवियत संघ के विघटन के बाद से NATO ने यूरोप में तेजी से विस्तार किया है और अब कई ऐसे देश भी NATO का हिस्सा हैं, जो पहले सोवियत संघ का हिस्सा रह चुके हैं-इनमें एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया शामिल हैं।

एस्तोनिया, लातविया और लिथुआनिया में हजारों की संख्या में NATO और अमेरिका सैनिक तैनात हैं, इन तीनों ही देशों की सीमाएं रूस से लगती हैं।

अगर यूक्रेन भी NATO से जुड़ता है तो अमेरिकी सैन्य गठबंधन की रूस के आसपास के इलाके में प्रभुत्व और बढ़ेगा, जो रूस के हितों के लिए कतई अच्छा नहीं होगा।
NATO सेनाएं रूस की मांग मानकर रूस के आगे झुकने को तैयार नहीं हैं, क्योंकि ऐसा होने का मतलब होगा रूस को वो जीत मिलना जो उसे अमेरिका के साथ 1945 से 1990 तक 45 साल चले कोल्ड वॉर में भी नहीं मिली थी।

यूरोपीय देशों को अपनी ताकत का अहसास कराना

यूरोप अपनी तेल और गैस की जरूरतों के लिए काफी हद तक रूस पर निर्भर है। यही वजह है कि NATO के कई यूरोपीय सदस्य देश जैसे- फ्रांस, ब्रिटेन और जर्मनी, यूक्रेन को लेकर रूस के खिलाफ जुबानी आक्रामकता तो दिखा रहे हैं, लेकिन उस पर कड़े प्रतिबंध नहीं लगा पा रहे हैं। रूस इस विवाद से ज्यादातर अमेरिकी खेमे में खड़े रहने वाले यूरोपीय देशों को अपनी ताकत का अहसास कराना चाहता है।

दुनिया के कच्चे तेल के उत्पादन में रूस की हिस्सेदारी 13% है। दुनिया के तेल और गैस का करीब 30% हिस्सा रूस से आता है। यूरोप की जरूरतों का 30% कच्चा तेल और 40% गैस रूस से आती है।

यूक्रेन संकट के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं, जो सितंबर 2014 के बाद से सबसे ज्यादा हैं। युद्ध की स्थिति में तेल की कीमतों के और बढ़ने की आशंका है, ऐसा होने पर रूस की कमाई में इजाफा हो सकता है। रूस की GDP में 60% योगदान तेल और गैस का है।

2021 के अंत में यूक्रेन संकट बढ़ने पर रूस ने यूरोप को गैस सप्लाई में कटौती की थी, जिससे यूरोपीय देशों में बिजली की कीमत पांच गुना तक बढ़ गई थी।

NATO के कई यूरोपीय सदस्य देश अपनी गैस की जरूरतों के लिए रूस पर बुरी तरह निर्भर हैं। जर्मनी को अपनी जरूरत की गैस का 65%, इटली को 43%, फ्रांस को 16% रूस से मिलती है।

NATO के कुछ अन्य देशों जैसे- चेक रिपब्लिक, हंगरी और स्लोवाकिया अपनी गैस की कुल जरूरतों और पोलैंड 50% गैस की जरूरतों के लिए रूस पर ही निर्भर है।

अगर यूरोपीय देश रूस पर आर्थिक प्रतिबंध लगाते हैं तो बदले में रूस यूरोपीय देशों को गैस की सप्लाई बंद कर सकता है। ऐसा करने पर यूरोप में ऊर्जा संकट पैदा हो सकता है, जिससे वहां तेल और गैस की कीमतें आसमान को छू सकती हैं।

यूक्रेन मामले को देखते हुए जर्मनी रूस को समुद्र के अंदर बिछाई गई 1222 किलोमीटर लंबी नवनिर्मित नॉर्ड स्ट्रीम 2 गैस पाइपलाइन को बंद करने का धमकी दे रहा है, लेकिन ऐसा करने पर जर्मनी समेत यूरोप को ज्यादा नुकसान पहुंचेगा।

पुतिन चाहते हैं रूस के सोवियत संघ वाले दिन लौटाना

रूस का राष्ट्रपति बनने के बाद से ही व्लादिमिर पुतिन कई बार ये कह चुके हैं कि सोवियत संघ का विघटन ऐतिहासिक भूल थी। पुतिन रूस के सोवियत संघ वाले दिन लौटाना चाहते हैं।

1991 में रूसी प्रभुत्व वाले सोवियत संघ के विघटन से 15 नए देश बने थे, जिनमें से एक यूक्रेन भी था। पुतिन रूस का विस्तार करके उसका पुराना प्रभुत्व कायम करना चाहते हैं।

पुतिन की इस महत्वाकांक्षी योजना के लिए यूक्रेन सबसे महत्वपूर्ण है। 2015 में अपने एक भाषण में पुतिन ने यूक्रेन को ”रूस का मुकुट” कहा था।

सत्ता संभालते ही पुतिन ने सोवियत संघ का हिस्सा रहे जॉर्जिया के खिलाफ 2008 में युद्ध छेड़ दिया और उसके दो इलाकों साउथ ओसेशिया और अबखाज को स्वतंत्र घोषित करते हुए वहां रूसी सेनाएं तैनात कर दीं।

पुतिन ने कुछ ऐसा ही 2014 में यूक्रेन में किया। तब रूस ने 1950 के दशक से ही यूक्रेन का हिस्सा रहे क्रीमिया पर हमला करते हुए कब्जा कर लिया था।

पुतिन ने साथ ही यूक्रेन के दो पूर्वी इलाकों डोनेट्स्क और लुहान्स्क के एक बड़े इलाके पर रूस समर्थित अलगाववादियों की सरकारें बनवा दीं। अब रूस ने इन विद्रोही इलाकों को नए देश के रूप में मान्यता देते हुए वहां भी रूसी सैन्य बेस बनाने का रास्ता साफ कर दिया है।

वहीं यूक्रेन का पड़ोसी देश बेलारूस अपनी आर्थिक और सैन्य जरूरतों के लिए पूरी तरह रूस पर निर्भर है। रूस ने हाल ही में बेलारूस को 470 अरब रुपए का लोन दिया है।

2021 के चुनावों में धांधली और बेईमानी से जीत के आरोपों के बाद बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको को रूस के समर्थन से ही दोबारा सत्ता हासिल हुई थी। अब वह पूरी तरह रूसी समर्थन के आगे नतमस्तक हैं। कई विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में बेलारूस का रूस में विलय हो सकता है। कुल मिलाकर पुतिन धीरे-धीरे रूस के विस्तार करने की अपनी रणनीति में आगे बढ़ते और कुछ हद तक कामयाब होते भी दिख रहे हैं।

सत्ता पर पकड़ और लोकप्रियता दोनों बनाए रखना चाहते हैं पुतिन

1999 में रूस के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही व्लादिमिर पुतिन ने खुद को सत्ता में बनाए रखने के लिए हर संभव कोशिश की है।

चलिए जानते हैं कि कैसे पुतिन सत्ता और लोकप्रियता पर पकड़ ढीली नहीं होने देना चाहते-

16 साल रूसी खुफिया एजेंसी KGB में काम करने के बाद पुतिन 1991 में राजनेता बने थे। 1999 में वह बोरिस येल्तसिन के पद छोड़ने के बाद बाद रूस के राष्ट्रपति बने।

2004 में वह दोबारा राष्ट्रपति चुने गए, लेकिन रूसी संविधान के अनुसार लगातार दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति नहीं बनने के नियम के बाद वह 2008 से 2012 तक रूस के प्रधानमंत्री रहे।

2012 में पुतिन फिर से रूस के राष्ट्रपति बने और तब से पद पर कायम हैं। 2020 में रूसी संविधान में बदलाव से उनके 2036 तक रूस का राष्ट्रपति बने रहने का रास्ता साफ हो गया था।

पुतिन पर अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए संविधान में मनमाने बदलाव और चुनावों में धांधली और विपक्षी पार्टियों की आवाज दबाने के भी आरोप लगे हैं। 2021 में उन्होंने अपने प्रमुख विरोधी नेता एलेक्सी नवलनी को साढ़े तीन साल के लिए जेल भिजवा दिया था।

अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद हाल के वर्षों में पुतिन की लोकप्रियता में गिरावट आई है। अक्टूबर 2021 में आए लेवाडा सेंटर सर्वे के मुताबिक, पुतिन की लोकप्रियता पिछले एक दशक के न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है।

इस सर्वे के मुताबिक, 2021 में रूस के 53% लोगों ने पुतिन पर भरोसा जताया, जो अक्टूबर 2012 के 51% के बाद से सबसे कम है।

यूक्रेन के क्रीमिया पर हमले और उस पर कब्जे के बाद 2015 में पुतिन की लोकप्रियता सबसे ऊपर पहुंची थी, तब 80% रूसी लोगों ने पुतिन पर भरोसा जताया था।
यूक्रेन पर हमले से पहले भी पुतिन की लोकप्रियता में इजाफा हो चुका है, इसीलिए पुतिन फिर वैसा ही करके अपनी साख को फिर ऊंचा करना चाहते हैं।


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