ईमानदारी का महत्व

जरूर पढ़ें… ✍️
ईमानदार व्यक्ति व्यवस्था (System) समाज में निष्क्रिय क्यों हो जाता है ?
अथवा
ईमानदारी व्यवस्था में पहचान एवं बदलाव की हेतुक,प्रेरणा क्यों नहीं बन पाती
क्या हम किसी की नैतिक दृढ़ता, ईमानदारी को केवल अनुचित आर्थिक कदाचार,संव्यवहार तक ही देख और समझ सकते है ?

किसी ईमानदार के खुद के प्रति आत्मद्वंद्व, आत्ममुग्धता,भीरूता और डर एवं निष्क्रियता को भी ईमानदारी की कसौटी में ही शामिल करेंगे ?

अक़्सर हम देखते,सुनते है कि ईमानदार व्यक्ति एवं ईमानदारी को समाज,व्यवस्था में वो पहचान,अस्तित्व नहीं मिल पाता,
जिससे वो एक बदलाव के हेतुक के रूप में हमारे समक्ष परिलक्षित, लब्ध हों,
अथवा कहा जाता है कि ईमानदार लोग प्रायः सिस्टम/व्यवस्था (समाज) में एक समय काल के उपरांत निष्क्रिय जीवन को प्राप्त हो जाते है।

ऐसा क्यों है ?
क्योंकि ईमानदारी की पहचान एवं अस्तित्व के लिए ईमानदार व्यक्ति, ईमानदारी के साथ-साथ निडरता,सक्रियता,आत्ममुग्धतविहीन होना आवश्यक होता है
ईमानदारी और ईमानदार व्यक्तित्व के समक्ष केवल अनुचित आर्थिक प्रलोभन,आर्थिक भ्रष्ट कदाचार ही उसके विचलन के कारक नहीं होते,
बल्कि….
सबसे पहला विचलन कारक उसके समक्ष प्रकट होता है उसके इर्द-गिर्द प्रशंसा,चाटुकारिता, सेवा सुश्रुषा का जहाँ उसे आत्ममुग्धता की कसौटी पर परखा और जाँचा जाता है,

दूसरा कारक उसके समक्ष प्रकट होता है जहाँ व्यवस्था एवं उसकी नैतिकता के प्रति अनुचित लाभ,प्रलोभन एवं लालच दिया जाकर उसे भटकाव,विचलन के प्रति टेस्ट किया जाता है,

उसके बाद उसे व्यवस्था,समाज में अधिसंख्यक लोगों, व्यवस्था में अपनी पैठ,प्रभाव जमाए हुए लोगों द्वारा साम-दाम,दंड-भेद के तरीकों से भयभीत कर डराए जाने के हथकण्डे से विचलित, दिगाए जाने के प्रयास होते है,

तदुपरांत उसके अडिग,दृढ़ रहने की स्थिति-परिस्थिति में उसके विरूद्ध अधिसंख्यक बेईमान लोगों द्वारा drive, drained समाज,व्यवस्था में पूर्व से निर्धारित पूर्वाग्रहों, धारणाओं के आधार पर झूठी,शिकायतों, षड्यंत्रों से तोड़ने, प्रभावित किए जाने की दिशा में सामूहिक/संगठित कुत्सित प्रयास होते है,

सबसे बड़ा ईमानदारी के समक्ष विचलन का कारक है कि उपलब्ध अवसरों सहित किसी के नैतिक,ईमानदार होने के बावजूद उसका उस दिशा में यथोचित सम्मान,पहचान recognize नहीं हो पाना तथा उसके समानांतर बेईमान लोगों के समाज,व्यवस्था में प्रभावशीलता के साथ मौजूदगी,अस्तित्व का विद्यमान रहना।।

ऐसे में अधिकांश खुद के साथ नैसर्गिक रूप से पूर्णतया ईमानदार तथा कुछ परिस्थितियों विशेष के कारण निर्मित ईमानदार इन सोपानों/कर्मों में कहीं न कहीं अपनी नैतिक/ईमानदार दृढ़ता के प्रति विचलित/प्रभावित होकर कमजोर हो जाते है,
अथवा इन सबसे अन्तःक्रिया संघर्ष करते हुए टूटकर कमजोर होकर एक कम्फर्टेबल जोन/निष्क्रियता के आवरण में सम्मिलित हो जाते है।

इन सब कर्मों के बावजूद भी कुछ बिरले rare लोग निडरता, आत्ममुग्धताविहीन स्थिति में भी स्वप्रेरणा से सक्रिय होकर जो सक्रिय बने रहते है वे व्यवस्था, समाज में अपनी एक पहचान, वजूद/अस्तित्व को प्राप्त हो जाते है

ईमानदार लोगों को जीवन में अधिक अन्याय क्यों सहना पड़ता है?

इसका छोटा सा जवाब है कि वे खुद के लिए ईमानदार नहीं होते,
इसलिए उन्हें अन्याय/दुख सहना पड़ता है।

एक ईमानदार व्यक्ति में , यहां तक ​​कि छोटी से छोटी हरकतें भी ईमानदारी से संचालित होती है,

एक ईमानदार व्यक्ति, संक्षेप में, सबसे पहले खुद के साथ ईमानदार है और इसलिए, खुद को धोखा नहीं देगा

एक शब्द है ईमानदार, जो व्यक्ति के कर्मों के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है।
उसके कर्म की दिशा देखकर उसके व्यक्तित्व का गुण बताता है।
ईमानदार का विपरीतार्थक है बेईमान।
बेईमानी का प्रतिफल है भ्रष्टाचार। इन दिनों कहा जाता है कि समाज में भ्रष्टाचारियों की संख्या अधिक हो गई है।
अंगुलियां राजनेताओं व सरकारी अधिकारियों पर उठ रही हैं, बात ठीक भी है, उनसे समाज को नेतृत्व प्रदान करने की अपेक्षा रहती है।
वे ईमानदार होंगे, तो समाज ईमानदार होगा, एक बात ध्यान देने की है कि सबसे पहले कर्ता की ईमानदार नीयत अपेक्षित है।

हमारी नीयत Intention ही हमारे कर्मों का मूल है, इसलिए किसी व्यक्ति के कर्मो का आकलन करना हो,
तो उसकी नीयत को खंगालना चाहिए,
नीयत एक प्रकार का संस्कार है, जिसमें जन्मजात गुण की कम व अर्जित की मात्र अधिक होती है,

ईमानदार नीयत को अभ्यास और व्यवहार में लाने पर वह व्यक्ति की पहचान बन जाती है,
इसलिए छोटी-छोटी दिनचर्याओं में भी ईमानदार व बेईमान नीयत का प्रकटीकरण होता है,
लोग कहते रहते हैं, ‘नहीं!
यह व्यक्ति चाहकर भी बेईमान नहीं हो सकता।’
वह इसलिए भ्रष्ट नहीं बन सकता, क्योंकि भ्रष्टाचार उसके बूते की बात नहीं।
उसकी नीयत ईमानदार है,
अर्थात उसकी प्रकृति ईमानदार है।
अभ्यास करके ईमानदार नीयत अर्जित की जाती है,
एक बार ईमानदार नीयत का अभ्यास हो जाए व समाज में सिक्का जम जाए, फिर तो कहने ही क्या! ईमानदार नीयत से काम करने पर जो पहचान मिलती है, वह सुख देने वाली होती है।

अपने मन ,वचन और नीयत से ईमानदार आदमी खुद से ज़्यादा बेइमानो के लिए मुसीबत बने रहते हैं ,वो बेईमान उनकी परेशानी का सबब तो होते हैं लेकिन फिर भी एक ईमानदार व्यक्ति को डिगा नहीं पाते ,ईमानदार आदमी पैसे से परेशान हो सकता है लेकिन बाक़ी जगह वो ज़्यादा ख़ुश और संतुष्ट होता है ,जोड़ तोड़ के पचड़ों में नहीं पढ़ता ।मेरा अपना अनुभव है की ईमानदार और सच्चा आदमी ,तुलना करें अगर -तो एक झूठ और बेईमान आदमी से ज़्यादा क्रोध भी करता है ,शायद यह उसका आक्रोश हो ।अगर आप सच्चे हैं तो आप ज़्यादातर लोगों के लिए नुक़सानदायक हैं क्यूँकि उनकी झूठ और बेइमानी की दुकान आपके आगे चल नहीं पाएगी ,वो हर कदम पर आपके लिए परेशानी पैदा करेंगें ,उनकी नज़र में आप दिक़्क़त में दिखेंगे ज़रूर लेकिन फिर भी आप ही बेहतर मनोस्तिथि में होंगे।

एक ईमानदार व्यक्ति परिस्तिथियों के अनुसार अपने आपको ढालने की कोशिश करता है ,उसकी इच्छाएँ होती भी हैं तो वह उनको वाजिब और luxury में बाँटकर उनकी प्राथमिकता तय करके उनको पूरा करने की कोशिश करेगा ,ज़रूरी नहीं कि हर luxurious demand ग़ैरवाजिब ही हो फिर भी उनके लिए चाहे कोशिश हो या पैसा -दोनों ही ज़्यादा चाहिए ।वैसे ईमानदारी अब कम ही दिखती है क्यूँकि हम सब मन ही मन यह स्वीकार कर चुके हैं कि अब सौ फ़ीसदी ईमानदार अब नहीं मिल सकते चाहे वह कोई भी profession हो ,कम बेईमान को ही ईमानदार मान लेना ही शाश्वत सत्य है।

ईमानदारों के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे ईमानदार होते हैं और हमेशा इस खुशफहमी में जीते हैं कि धरती पर अकेला वही ईमानदार हैं, बाकी सब बेईमान।

उन जैसा ईमानदार न पहले कभी हुआ था, न भविष्य में होगा।
उनसे मिलो, तो लगता है कि होना भी नहीं चाहिए।

ऐसे लोगों का स्टिंग जब बाजार में टीआरपी बटोरता है, तो वे यह कहकर दुनिया सिर पर उठा लेते हैं कि उन्हें साजिशन बदनाम किया और करवाया जा रहा है, कोई भी बेईमान ऐसे मौके पर चुप मारकर बैठ जाता है।

बेईमान की सबसे अच्छी बात यह होती है कि उसे किसी तरह के प्रमाण-पत्र की जरूरत नहीं होती, वह न तो अपनी बेईमानी का ढिंढ़ोरा पीटता है और न अपनी ईमानदारी का ढोल।
किसी भी मुश्किल में पड़ने पर वह ईमानदारी की आड़ कभी नहीं लेता।

पोल हमेशा किसी ‘ईमानदार’ की ही खुलती है,बेईमान की पोल कभी खुलते देखी है आपने….

अतः ईमानदारी इस प्रकार तभी सक्रिय और प्रकट है तब आप खुद के प्रति पूर्णता में निडरता,आत्ममुगढताविहीन होकर सक्रियता के साथ हमेशा स्वप्रेरणा से सक्रियता के दृष्टिकोण, नजरिए को लब्ध हो जाते है

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