बाजारवाद का चोगा

सुंदरता का #बाजारवाद #मिस #वर्ल्ड, मिस यूनिवर्स
सुन्दर महिलाओ की चुनने की जो प्रतियोगिताये होती है वो असल में बाज़ारवाद होता है….. विश्व सुंदरी उस देश की चुनी जाती है जहाँ बाज़ारवाद का सेंटर बनाना होता है अर्थात जिस देश में सौंदर्य प्रसाधनों के द्वारा दोहन होना होता है वही सुंदरता की देवी चुनी जाती है (आप 1951 लेकर अब तक जाँच कर लीजिये कि जब जब किसी देश से विश्वसुंदरी चुनी गयी उसके बाद उस देश की स्त्रियों का सौंदर्य प्रसाधनों का बहुत बड़ा बाजार खड़ा हुआ और वैश्विक कम्पनियो ने बड़ा मुनाफा कमाया)
सबसे पहले इसे 1951 में ब्रिटेन ने मिस वर्ल्ड के नाम से इसका संचालन शुरू किया था और यहां की आबादी के कारण टारगेट भारत ही था और अंग्रेजो के शासन दौरान वे यहाँ की काली और सांवली औरतो में सुन्दर होने की कुंठा तो पैदा कर ही चुके थे जिससे 40 के दशक तक तो भारत की महिलाये मेकअप करके खुद को अंग्रेजी मेम समझने लगती थी ! नेहरू जी ने समय की नब्ज पहचानते हुए टाटा के साथ मिलकर लक्मे इंट्रोड्यूज करवा दिया था जिससे ब्रिटेन के महंगे प्रोडक्ट्स की जगह लक्मे के सस्ते प्रोडक्ट्स तुरंत रिप्लेस हो गये और देश का दोहन होने से बच गया मगर तब से ब्रिटेन को एक रास्ता मिल गया दुनिया की आधी आबादी को दोहन करने का…… इसलिये उसने अपनी ये मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता जारी रखी और भारत में अपना बाज़ारवाद खड़ा न कर पाने के कारण स्वीडन में अपना बाज़ारवाद खड़ा किया क्योंकि हर स्त्री में और अधिक सुन्दर दिखने की कुंठा होती है और उसके लिये वो कुछ भी करने को तैयार हो जाती है (ज्यादातर लड़कियां पटाने वाले इसी कमजोरी का इस्तेमाल कर लड़कियां पटाते है अर्थात उनकी सुंदरता की झूठी तारीफ करके ही पटाते है और उनका दैहिक शोषण कर उन्हें छोड़ देते है और बुद्धिमान से बुद्धिमान लड़की भी सुंदरता की झूठी तारीफ के झांसे में आकर खुद शिकार बनती ही है)
बहरहाल… जब 1951 में यूके ने विश्वसुंदरी प्रतियोगिता ताज स्वीडन को देकर अपना बाज़ारवाद एक साल से भी कम समय में खड़ा कर लिया तब विश्व का बादशाह बनने को लालायित यूएसए ने ब्रिटेन के इस धोखे को उजागर करने और अपना बाजार बनाने के लिये 1952 में दूसरे पेजेंट का अपने स्तर से आयोजन करवाया अर्थात मिस यूनिवर्स के नाम से प्रतियोगिता ऑर्गनाइज करवायी जो मानव जीवन के सकारात्मक पहलुओं को दर्शाने का एक जरिया भी बना और यूएसए का एक बड़ा बाज़ारवाद पुरे विश्व में रोपित हो गया (उसी के कारण आज भी अमेरिका विश्व का बेताज बादशाह बना हुआ है)
1993 में नरसिम्हा राव की उदारीकरण निति के बाद भारत एक बड़ा मंच बन गया जो वैश्विक बाज़ारवाद में सबसे ज्यादा दोहन होने वाला देश बना और इसके लिये भारत को सब्जबाग दिखाये गये, यहाँ स्त्रियों को बाज़ारवाद में शामिल करने के लिये उन्हें कुंठित किया गया जिससे वे आसानी से सौंदर्य प्रसाधनों की शिकार बने और इसके लिये 1994 में ऐश्वर्या राय को और सुष्मिता सेन को ये मिस वर्ल्ड और मिस यूनिवर्स का ताज पहनाया गया और इसका रिटर्न भी तेजी से मिला… भारत की महिलाओ में उसके बाद सुंदर दिखने की होड़ मच गयी, पारावारिक बजट में सौंदर्य प्रसाधनों का खर्च जरूरी तौर पर जुड़ गया !
90 के दशक बाद में इस बाज़ारवाद में भी बड़ा बदलाव आया और बड़े बिजनेस टाइकून सौंदर्य प्रसाधनों में अपनी मोनोपोली बनाने लगे…. इसी दौर में ट्रंप ने मिस यूनिवर्स का अधिग्रहण कर लिया और जो प्रतियोगिता सकारात्मक पहलु दर्शाने और यूएसए का बाजार खड़ा करने के लिये शुरू हुई थी वो एक व्यापारी की तिजोरी भरने का जरिया बन गयी. चुनी जाने वाली प्रतियोगी के साथ लम्बा-चौड़ा डीड/अग्रीमेंट बनने लगा, नियम तय होने लगे….. चुनी जाने वाली प्रतियोगी को फेमस करना और उसके जरिये विज्ञापन करवाना आम सिद्धांत हो गया और इसके लिये फिल्म मिडिया से लेकर न्यूज मिडिया तक का इस्तेमाल किया जाने लगा…. सोसल मिडिया आया तो उसका भी इस्तेमाल होने लगा !
अभिनय आये या न आये उन्हें फिल्मो में उतारा गया और उसके लिये ढके-छुपे तौर पर पीछे से फाइनेंस किया गया ताकि चुनी जाने वाली प्रतियोगी अपने देश में प्रसिद्द हो और जिस चीज़ का वो विज्ञापन करे उसे लोग हाथोहाथ ले और इसी बाज़ारवाद को बनाये रखने के लिये 1997 में डायना हेडेन, 1999 में युक्तमुखी, 2000 में प्रियंका चोपड़ा और लारा दत्ता, 2017 में मानुषी छिल्लर को इसका ताज पहनाया गया…. सिर्फ यही शादीशुदा और बढ़ती उम्र की महिलाओ में भी इसके प्रति लालसा पैदा करने के लिये 2001 अदिति गोवित्रिकर को मिसेज वर्ल्ड का ताज पहनाया गया ताकि भारत की बड़ी आबादी इस बाज़ारवाद का आसानी से दोहन होकर शिकार बनी रहे…..2021 में हरनाज कौर को ताज पहनाया जाना इसी बाज़ारवाद का हिस्सा है !
(भारत की आधी आबादी यानि स्त्रियां चीन को छोड़कर शेष विश्व की संपूर्ण आबादी की स्त्रियों का 35% है अर्थात भारत का बाजार दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और इसी कारण हर 2-3-4 साल में भारत को चुना जाता है ताकि मेहनत से की गयी कमाई को सौंदर्य प्रसाधनों के जरिये आसानी से लूटा जा सके)
नई जनरेशन को नहीं पता होगा लेकिन जो सेकेण्ड और थर्ड जनरेशन है वो अच्छे से जानते है कि 90 के दशक से पहले ज्यादातर औरते लिपस्टिक तक आमतौर पर इस्तेमाल नहीं करती थी लेकिन आज के दौर की तो भावी जनरेशन अर्थात दस-बारह साल की लड़किया तक इस बाज़ारवाद का शिकार है और मेकअप तो छोड़िये वैक्स तक इस्तेमाल करती है तो सोचकर देखिये कि सुंदरता का कितना बड़ा वैश्विक बाजार जबरन खड़ा कर दिया गया है !
ऐसा सिर्फ भारत के साथ ही नहीं बल्कि पुरे विश्व की स्त्रियों के साथ किया गया है इसी कारण आज हर विज्ञापन में स्त्रियों को डाला जाता है क्योंकि वैश्विक बाज़ारवाद की सबसे बड़ी उपभोक्ता ही स्त्रियां है फिर चाहे वो स्वयं के लिये हो या पुरुष के लिये, वरना आप सोचकर देखिये पुरुष के अंडरगार्मेंट जैसी वस्तु जो दिखायी भी नहीं देती उसमे भला महिलाओ को दिखाने का क्या औचित्य है ?
सोचकर देखिये और बाज़ारवाद का शिकार होने से बचिये !
स्वर्ग की अप्सराओ की तरह सुंदर साइबेरियन महिलाये पश्चात पीओके अधिकृत गिलगित/बाल्टिस्तान और भारत में कश्मीर और उत्तराखंड की स्त्रियां हर वर्ष विश्वसुंदरी या ब्रह्माण्ड सुंदरी इसीलिये नहीं चुनी जाती क्योंकि वे प्राकृतिक रूप से इतनी सुंदर है कि कोई बाज़ारवाद उनका दोहन नहीं कर सकता और न ही कोई सौंदर्य प्रसाधन उनके मार्फ़त बाज़ारवाद खड़ा कर सकता है !
बाज़ारवाद के लिये उन्हें ऐसी स्त्री चाहिये होती है जो सौंदर्य प्रसाधनों के जरिये सुंदर दिखाई जा सकती हो और वे सौंदर्य प्रसाधनों में आपको निम्बू-मिर्च और प्याज से लेकर बादाम और दूध तक शामिल होने का झांसा देकर बेच सके !
मुझे आज तक इसका भी औचित्य समझ में नहीं आया कि किसी साबुन-शैम्पू में या तेल-क्रीम में बादाम या दूसरी ऐसी वस्तुए डालकर पोषण कैसे मिलेगा जो शरीर का ब्राह्य उत्पाद है क्योंकि न्यूटीशियन्संस और शरीर वैज्ञानको के अनुसार शरीर के पोषण के लिये उत्पाद का पेट में जाकर डाइजेस्ट होना जरूरी होता है क्योंकि उस डाइजेस्ट हुए खाद्य से रस और दूसरे सभी जरूरी हार्मोन्स का निर्माण होता है और उसी से शरीर को पोषण और सुंदरता प्राप्त होती है…… लेकिन अपने बाज़ारवाद को बनाये रखने के लिये और स्त्रियों को उपभोक्ता बनाये रखने के लिये पहले वे आपको जरूरी पोषक खाद्यपदार्थो से दूर करते है और बाद में उसी पदार्थ को आपके साबुन-तेल-पेस्ट में होने का दावा करके बेचते है !
जैसे – कोलगेट 90 के दशक में ‘नमक दांतो के लिये हानिकारक है’, का विज्ञापन करता था मगर अब ‘क्या आपके पेस्ट में नमक है’? कहकर बेचता है और आप तब भी बाज़ारवाद का शिकार थे और अब भी बाज़ारवाद का शिकार हो, क्योंकि तब आपने नमक वाला आयुर्वेदिक पाउडर, कोयला और दांतुन त्याग दिया था और अब वही कम्पनिया जानवरो की हड्डियों का पेस्ट बनाकर और उसमे कृत्रिम नमक, कोयला और पेड़ो की लकड़ी का रस मिलाकर बेच रही है अर्थात जो वस्तु पहले आपको फ्री में उपलब्ध थी, उसे छुड़वाया और फिर उसी वस्तु को महंगे दाम लेकर आपको बेच रही है !
इसी तरह के उदाहरण केश तेलों में भी है जैसे पहले घाणी का शुद्ध बादाम रोगन बालो में लगाया जाता था उसे ख़राब बताकर छुड़वाया और अब मिनरल ऑयल में 2% एसेंस मिलाकर आपको बादाम तेल कहकर आमंड ऑयल के नाम से बेचा जा रहा है !
बाज़ारवाद में ओनियन ऑयल तक बेचा जा रहा है जबकि ये साबित तथ्य है कि ओनियन से ऑयल निकलता ही नहीं इसीलिये जब तक आप स्वयं जागरूक नहीं बनेगे तब तक आपका दोहन होता रहेगा और आप बाज़ारवाद का शिकार बने रहेंगे !
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